जानिये कुछ रोचक और ख़ास बातें वानर राज बालि के बारे में| Jaaniye kuch rochak aur khaas baatein vaanar raj baali ke baare mein

Ramayan ki Kahaniya

जानिये कुछ रोचक और ख़ास बातें वानर राज बालि के बारे में| Jaaniye kuch rochak aur khaas baatein vaanar raj baali ke baare mein

 

मित्रो (friends) आइये जानते है रामायण (ramayan) के एक प्रमुख पात्र वानर राज बालि से जुडी कुछ रोचक और ख़ास बातें जैसे की आखिर क्यों वानर राज बाली नहीं जा सकता था ऋष्यमूक पर्वत पर ?, आखिर क्यों उसने दबाया था रावण को अपनी बगल में?, मरते वक़्त कौन सी तीन ज्ञान की बातें बताई थी अंगद को? ….

श्रीराम को सुग्रीव ने दी थी बालि के पराक्रम और शक्तियों की जानकारी

जब रावण सीता का हरण (kidnap) करके लंका ले गया तो सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण (ram aur lakshman) की भेंट हनुमान से हुई। ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान ने सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता करवाई। सुग्रीव ने श्रीराम को सीता की खोज में मदद करने का आश्वासन दिया। इसके बाद सुग्रीव ने श्रीराम के सामने अपना दुख बताया कि किस प्रकार बालि ने बलपूर्वक मुझे (सुग्रीव को) राज्य से निष्कासित कर दिया है और मेरी पत्नी (wife) पर भी अधिकार कर लिया है। इसके बाद भी बालि मुझे नष्ट करने के लिए प्रयास कर रहा है। इस प्रकार सुग्रीव ने श्रीराम के सम्मुख अपनी पीड़ा बताई तो भगवान ने सुग्रीव को बालि के आतंक (terror) से मुक्ति दिलाने का भरोसा जताया।

जब श्रीराम ने सुग्रीव के शत्रु बालि को खत्म करने की बात कही थी तो सुग्रीव ने उसके पराक्रम और शक्तियों (powers) की जानकारी श्रीराम को दी। सुग्रीव ने श्रीराम को बताया कि बालि सूर्योदय (sunrise) से पहले ही पूर्व, पश्चिम और दक्षिण के सागर की परिक्रमा करके उत्तर तक घूम आता है। बालि बड़े-बड़े पर्वतों (mountains) पर तुरंत ही चढ़ जाता है और बलपूर्वक शिखरों को उठा लेता है। इतना ही नहीं, वह इन शिखरों को हवा में उछालकर फिर से हाथों में पकड़ लेता है। वनों में बड़े-बड़े पेड़ों (trees) को तुरंत ही तोड़ डालता है।

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बालि ने दुंदुभि नामक असुर का किया था वध

सुग्रीव ने बताया कि एक समय दुंदुभि नामक असुर था। वह बहुत ही शक्तिशाली (powerful) और मायावी था। इस असुर की ऊंचाई कैलाश पर्वत के समान थी और वह किसी भैंसे (bull) की तरह दिखाई देता था। दुंदुभि एक हजार हाथियों का बल (power of 1000 elephants) रखता था।

अपार बल के कारण वह घमंड से भर गया था। इसी घमंड में वह समुद्र देव के सामने पहुंच गया और युद्ध के लिए उन्हें ललकारने लगा। तब समुद्र ने दुंदुभि से कहा कि मैं तुमसे युद्ध करने में असमर्थ हूं। गिरिराज हिमालय (himalaya) तुमसे युद्ध कर सकते हैं, अत: तुम उनके पास जाओ। इसके बाद वह हिमालय (himalaya) के पास युद्ध के लिए पहुंच गया। तब हिमालय ने दुंदुभि को बालि से युद्ध करने की बात कही।

इस कारण ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जाता था बालि

सुग्रीव ने बताया कि बालि देवराज इंद्र का पुत्र (son) है, इस कारण वह परम शक्तिशाली है। जब दुंदुभि ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा तो उसने विशालकाय दुंदुभि को बुरी तरह-तरह मार-मारकर परास्त कर दिया था। जब पर्वत के आकार का भैंसा दुंदुभि मारा(killed) गया तो बालि ने दोनों हाथों से उठाकर उसके शव को हवा में फेंक दिया। हवा में उड़ते हुए शव से रक्त की बूंदें मतंग मुनि के आश्रम में जा गिरीं। इन रक्त की बूंदों से मतंग मुनि का आश्रम अपवित्र हो गया।

इस पर क्रोधित होकर मतंग मुनि ने श्राप (curse) दिया कि जिसने भी मेरे आश्रम और इस वन को अपवित्र किया है, वह आज के बाद इस क्षेत्र में न आए। अन्यथा उसका नाश हो जाएगा। मतंग मुनि के श्राप के कारण ही बालि ऋष्यमूक पर्वत क्षेत्र (area) में प्रवेश नहीं करता था।

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मरते वक़्त बालि ने बताई थी अंगद को तीन काम की बातें

रामायण में जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल (injured) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान (knowledge) की कुछ बातें बताई थीं। ये बातें आज भी हमें कई परेशानियों (problems) से बचा सकती हैं। यहां जानिए ये बातें कौन सी हैं…

मरते समय बालि ने अंगद से कही ये बातें
बालि ने कहा- देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाण: प्रियाप्रिये।
सुखदु:खसह: काले सुग्रीववशगो भव।।

इस श्लोक में बालि ने अगंद को ज्ञान की तीन बातें बताई हैं…

1. देश काल और परिस्थितियों (situations) को समझो।
2. किसके साथ कब, कहां और कैसा व्यवहार (behavior) करें, इसका सही निर्णय लेना चाहिए।
3. पसंद-नापसंद, सुख-दु:ख को सहन करना चाहिए और क्षमाभाव के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए।

बालि ने अंगद से कहा ये बातें ध्यान रखते हुए अब से सुग्रीव के साथ रहो।
आज के समय में भी यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो हर इंसान बुरे समय से बच सकता है। अच्छे-बुरे हालात में शांति और धैर्य (patience) के साथ आचरण करना चाहिए।

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ये है बालि वध का प्रसंग

जब बालि श्रीराम के बाण से घायल (injured) होकर पृथ्वी (earth) पर गिर पड़ा, तब बालि में श्रीराम से कहा कि आप धर्म की रक्षा करते हैं तो मुझे (बालि को) इस प्रकार बाण क्यों मारा?

इस प्रश्न के जवाब में श्रीराम ने कहा कि छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी और पुत्री, ये सब समान होती हैं और जो व्यक्ति इन्हें बुरी नजर से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता है। बालि, तूने अपने भाई सुग्रीव की पत्नी पर बुरी नजर रखी और सुग्रीव को मारना चाहा। इस पाप के कारण तुझे बाण मारा है। इस जवाब से बालि संतुष्ट हो गया और श्रीराम से अपने किए पापों की क्षमा याचना (feeling sorry) की। इसके बाद बालि ने अगंद को श्रीराम की सेवा में सौंप दिया।

इसके बाद बालि ने प्राण त्याग दिए। बाली की पत्नी तारा विलाप करने लगी। तब श्रीराम ने तारा को ज्ञान दिया कि यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से मिलकर बना है। बालि का शरीर तुम्हारे सामने सोया है, लेकिन उसकी आत्मा (soul) अमर है तो विलाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार समझाने के बाद तारा शांत हुई। इसके बाद श्रीराम में सुग्रीव को राज्य सौंप दिया।

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बाली ने रावण को दबाया था अपनी कांख में

पृथ्वी तल के समस्त वीर योद्धाओं (brave soldiers) को परास्त करता हुआ रावण बालि से युद्ध करने के लिए गया। उस समय बालि सन्ध्या के लिए गया हुआ था। वह प्रतिदिन (everyday) समस्त समुद्रों के तट पर जाकर सन्ध्या करता था। बालि के मन्त्री तार के बहुत समझाने पर भी रावण बालि से युद्ध करने की इच्छा से ग्रस्त रहा। वह सन्ध्या में लीन बालि के पास जाकर अपने पुष्पक विमान से उतरा तथा पीछे से जाकर उसको पकड़ने की इच्छा से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बालि ने उसे देख लिया था किंतु उसने ऐसा नहीं जताया तथा सन्ध्या करता रहा। रावण की पदचाप से जब उसने जान लिया कि वह निकट है तो तुरंत उसने रावण (ravan) को पकड़कर बगल में दबा लिया और आकाश में उड़ने लगा। बारी-बारी में उसने सब समुद्रों के किनारे सन्ध्या की। राक्षसों ने भी उसका पीछा किया। रावण ने स्थान-स्थान पर नोचा और काटा किंतु बालि ने उसे नहीं छोड़ा। सन्ध्या समाप्त करके किष्किंधा के उपवन में उसने रावण को छोड़ा तथा उसके आने का प्रयोजन पूछा। रावण बहुत थक गया था किंतु उसे उठाने वाला बालि तनिक भी शिथिल नहीं था। उससे प्रभावित होकर रावण ने अग्नि को साक्षी बनाकर उससे मित्रता (friendship) की।

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